इज्ज़त
आती हूँ अम्मा, कहकर वह पढनें चली गयी
कंधे पर बस्ता लादे, दुपट्टे को संभालते हुए,
आज कुछ नया सीखेंगे हम ,
आखों में उसके ऐसी चमक थी।
आखों में उसके ऐसी चमक थी।
वो दिन भी क्या दिन था जब आशाएं उसकी बुलंद थी।।
सहम सी गई वह बच्ची जब झाडियों ने थोडी हरकत की,
कदम लड़खड़ायए और साँसे थमी ।
जब भीतर से रूह उसकी ,
डर कर कांप उठी।।
शैतानो का था डेरा वहाँ ,इस बात से
वह बेखबर थी।
हैवानो ने अपना रंग दिखाया, और
उस हैवानियत की कोई सीमा ना थी।।
उस बच्ची की चिखे पूरे ब्रह्मांड में गून्जी ।
सुनकर भी सब पथ्थर बने रहे ,जब
बीच सड़क पर लुटती रही ,
हमारे देश की पूंजी।।
आंखे जब खुली तब अपनी अवस्था वह देख न सकी ।,
जिस इज्ज़त पर उसको अभिमान था आज लगा,
कि वो इज्ज़त कही बीच बाज़ार में
सरेआम बीक चुकी।।
वो बच्ची तड़पती रही,
वो बच्ची चिल्लाती रही ।
लाख कोशिशे की उसने खुद बचाने की,
परंतु फिर भी वो उन हैवानो से हार चुकी।।
यह मेरा दावा हैं कि इस दुनियाँ में ,
न कोई इंसान हैं और न ही कोई इंसानियत।
अगर आज कुछ हैं तो वो सिर्फ लालच,
इर्ष्या ,हवस, अहंकार और हैवानियत।।
ना मैं ना आप , हम सब उसका दर्द नही समझ सकते
जिसपर यह बीती है ।
फिर भी साहसी जीना चाहती थी,
"निर्भया'' जिसका नाम था,
जो हमारे देश की बेटी है।।
रोती है बन्द कमरे में, तडपती हैं दिन-रात
घिन्न आती हैं उसे अपनेआप से, क्योंकि
अशुद्ध हो गयी हैं वह आज।
बिन खिले मुरझा गयी वह सुन्दर कली,
जब भँवरे भी हो गए उस्से नाराज़।।
वो सारे मर्द जो चौबीस घंटे अपनी आंखे हमपर गडाए हैं,
जो हम औरतों की रक्षा में
नही छोड़ना चाहतें कोई कसर।
आरे! आधे से ज़्यादा परेशानी तो वही कम हो जायेगीं ,
बस तुम हमपर से हटा लो अपनी नज़र,
कृपया कर हटा लो अपनी नज़र।।
कदम लड़खड़ायए और साँसे थमी ।
जब भीतर से रूह उसकी ,
डर कर कांप उठी।।
शैतानो का था डेरा वहाँ ,इस बात से
वह बेखबर थी।
हैवानो ने अपना रंग दिखाया, और
उस हैवानियत की कोई सीमा ना थी।।
उस बच्ची की चिखे पूरे ब्रह्मांड में गून्जी ।
सुनकर भी सब पथ्थर बने रहे ,जब
बीच सड़क पर लुटती रही ,
हमारे देश की पूंजी।।
आंखे जब खुली तब अपनी अवस्था वह देख न सकी ।,
जिस इज्ज़त पर उसको अभिमान था आज लगा,
कि वो इज्ज़त कही बीच बाज़ार में
सरेआम बीक चुकी।।
वो बच्ची तड़पती रही,
वो बच्ची चिल्लाती रही ।
लाख कोशिशे की उसने खुद बचाने की,
परंतु फिर भी वो उन हैवानो से हार चुकी।।
यह मेरा दावा हैं कि इस दुनियाँ में ,
न कोई इंसान हैं और न ही कोई इंसानियत।
अगर आज कुछ हैं तो वो सिर्फ लालच,
इर्ष्या ,हवस, अहंकार और हैवानियत।।
ना मैं ना आप , हम सब उसका दर्द नही समझ सकते
जिसपर यह बीती है ।
फिर भी साहसी जीना चाहती थी,
"निर्भया'' जिसका नाम था,
जो हमारे देश की बेटी है।।
रोती है बन्द कमरे में, तडपती हैं दिन-रात
घिन्न आती हैं उसे अपनेआप से, क्योंकि
अशुद्ध हो गयी हैं वह आज।
बिन खिले मुरझा गयी वह सुन्दर कली,
जब भँवरे भी हो गए उस्से नाराज़।।
वो सारे मर्द जो चौबीस घंटे अपनी आंखे हमपर गडाए हैं,
जो हम औरतों की रक्षा में
नही छोड़ना चाहतें कोई कसर।
आरे! आधे से ज़्यादा परेशानी तो वही कम हो जायेगीं ,
बस तुम हमपर से हटा लो अपनी नज़र,
कृपया कर हटा लो अपनी नज़र।।
ABOUT THE POEM :- This poem is very special for me.My above poem is dedicated to all the daughters of our nation who went through the horrific incident of rape. Yet, our brave daughters have fought against those devils and have created history along with a huge place in our hearts.They will always be remembered as the ' 'Warriors' of our nation.