पिंजरा
सुन्दर सी चिड़ियाँ जिसके पंखो में ,
दुनियाँ नापने की शक्ती हैं।
खुले आसमान मे उड़ना तो उसका हक्क हैं,
फिर क्यों अपने पंख फड़फड़ाने पर भी उसे पाबंदी हैं।।
नैन मटकतें उस स्वर्ण के पिंजरे में,
खुशिया भी उस्से आंख मिचौली जो खेलती हैं।
'खुदा' की उम्मीद तो आज भी उसे है,
इसलिये तो खोज तलाश आज भी जारी है।।
हिम्मत नही हारती है, अपनी चोंच से
हर दिन उस पिंजरे को काटती हैं।
उमीदों का भंडार है वो,जिसके सिर पर
'शिवजी' का आशीर्वाद ,
तो शरीर मे काली माँ की शक्ती हैं।।
समाज के लोग तो समाज की प्रथाए,
हर कोई उसे अपने जाल मे फंसाना चहता हैं।
पर भूल गए सब की वह एक चिड़िया है,ऐसी चिड़िया
जिसे पाना तो दूर, उसकी उंचाई ही देखकर हर
निर्दयी अपनी जान भी गवाता हैं।।
लोगो ने बहुत कोशिश की, उसे जकडे रखने की,
और उसके पंखो को काटने की।
पर उन बेड़ियो में उत्नी ताकत ही नही थी,
उसके हौसले के आग की गर्माहट को झेलने की।।
वोह लोहा अब पिघल गया,
वोह पिंजरा अब टूट गया,
उस खूबसूरत चिड़िया को आसमान में उड़ता हुआ देखकर,
छोटी सी चीटियां ही नही ,बल्कि
बड़े बड़े हाथियों का झुंड भी, खुशी से जगमगा गया।।
ABOUT THE POEM:This poem is dedicated to all those girls who are not able to live their life how they want.